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वंश और प्रारंभिक जीवन

महाराजा अग्रसेन सूर्यवंश में एक क्षत्रिय परिवार में जन्मे थे। वे प्रताप नगर के राजा बल्लभ के सबसे बड़े पुत्र थे। ग्रंथों के अनुसार उनका जन्म द्वापर युग के अंत और कलियुग के प्रारंभ में हुआ था (लगभग 5100 वर्ष पूर्व)। युवा राजकुमार के रूप में वे अपनी करुणा और वीरता के लिए जाने जाते थे। उन्होंने नागराज (एक नाग राजा) की पुत्री राजकुमारी माधवी के स्वयंवर में भाग लिया। माधवी ने देवों के राजा इंद्र के स्थान पर अग्रसेन को चुना। इस विवाह ने सूर्यवंश और नाग जाति को एकजुट किया।

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महाराजा अग्रसेन - संस्थापक

महाराजा अग्रसेन ने अग्रोहा की स्थापना की और अहिंसा, समानता और आपसी सहयोग को बढ़ावा दिया। उन्होंने नवांगतुकों को जीवन की शुरुआत करने के लिए समाज के लोगों को दान स्वरूप (“एक रुपया, एक ईंट”) देने को प्रोत्साहित किया।

क्षत्रिय से वैश्य परंपरा की ओर रूझान

माधवी से विवाह के बाद ईर्ष्यालु भगवान इंद्र ने अग्रसेन के राज्य में वर्षा रोक दी, जिससे भयंकर अकाल पड़ा। अग्रसेन ने इंद्र पर युद्ध की घोषणा कर दी। हालांकि युद्ध से होने वाली तबाही को देखकर और यह समझकर कि हिंसा से कुछ हल नहीं होता, उन्होंने एक अलग मार्ग अपनाया। उन्होंने देवी महालक्ष्मी को प्रसन्न करने के लिए कठोर तपस्या की। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर देवी महालक्ष्मी प्रकट हुईं और उन्हें क्षत्रिय परंपरा के शस्त्रों को त्यागकर वैश्य धर्म (व्यापार और वाणिज्य) अपनाने की सलाह दी। उन्होंने अग्रसेन को आशीर्वाद देते हुए कहा कि उनके वंशज समृद्धि और व्यापारिक कुशलता के लिए जाने जाएंगे।

स्वर्णिम सिद्धांत: "एक ईंट, एक रुपया"

अपने अग्रोहा राज्य में समानता सुनिश्चित करने और गरीबी को दूर करने के लिए, महाराजा अग्रसेन ने एक क्रांतिकारी समाजवादी कानून बनाया। "अग्रोहा में बसने की इच्छा रखने वाले प्रत्येक आप्रवासी को शहर के प्रत्येक मौजूदा परिवार द्वारा एक रुपया और एक ईंट दी जानी चाहिए।" ईंटों से नवागंतुक को घर बनाने में मदद मिली और एकत्रित धन से व्यापार शुरू करने के लिए पूंजी प्राप्त हुई। इससे यह सुनिश्चित हो गया कि कोई भी बेघर या बेरोजगार नहीं रहेगा।

अग्रवाल समाज एवं व्यापार

कुलदेवी माँ महालक्ष्मी के आशीर्वाद स्वरूप आज भी पारंपरिक व्यापार जगत में अग्रवाल समाज की अहम हिस्सेदारी एवं प्रभुत्व है। इसके साथ ही अग्रवाल समाज के सदस्य धार्मिक एवं सामाजिक सेवा के क्षेत्र में भी सराहनीय कार्य कर रहे हैं।

18 गोत्र और अहिंसा

महाराजा अग्रसेन ने अपनी प्रजा की समृद्धि के लिए 18 महान यज्ञ किए। इन यज्ञों के दौरान 18 विशिष्ट गोत्रों का गठन हुआ, जिनका नाम यज्ञ संपन्न कराने वाले ऋषि के नाम पर रखा गया।

अग्रवाल समाज के 18 गोत्र

गर्ग
गोयल
गोयन/गंगल
बंसल
कंसल
सिंघल
मंगल
जिंदल
तिंगल
ऐरण
धारण
मधुकुल
बिंदल
मित्तल
तायल
भंडल
कुच्छल
नांगल

18वां यज्ञ और अहिंसा

18वें यज्ञ के दौरान अग्रसेन ने देखा कि बलि के लिए ले जाए जा रहे एक घोड़े को बहुत कष्ट हो रहा है। करुणा से भरकर उन्होंने तुरंत यज्ञ रोक दिया। उन्होंने घोषणा की कि उनका राज्य अहिंसा के मार्ग का अनुसरण करेगा और किसी भी पशु की बलि नहीं दी जाएगी। यही कारण है कि अग्रवाल समुदाय पारंपरिक रूप से शाकाहारी है।